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धीरे-धीरे चल रहा है कारवां

Posted On: 18 Nov, 2010 sports mail में

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Sandhyarani Devi wushuअभी तक एशियन गेम्स के पांच दिन खत्म होने तक हमने 1 स्वर्ण 7 रजत और 7 कांस्य पदक जीते हैं और पदक तालिका में हमारा स्थान 11वां है. भले ही अब तक हमारा प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है लेकिन आने वाले दिनों में हम ज़रुर अच्छा करेंगे. लेकिन भारतीय खिलाड़ियों द्वारा अच्छा प्रदर्शन न करने के बाद भी हमें खुश होना चाहिए. लेकिन क्यों?

एशियन गेम्स में कल हमने रोइंग में दो पदक जीते. रोइंगः मेन्स फोर में भारत के अनिल कुमार, साजी थॉमस, रंजीत सिंह और जेनिल कृष्णन ने रोइंग में हमें पहला रजत पदक दिलाया वहीं लाइटवेट मेन्स फोर में लोकेश कुमार, मंजीत सिंह, राजेश कुमार यादव और सतीश जोशी ने भी रजत पदक जीता. इसके अलावा वांगखेम संध्यारानी देवी ने महिलाओं की 60 किग्रा वुशु प्रतियोगिता में रजत पदक जीतते हुए इतिहास बनाया. यही नहीं इससे पहले बिमोलजीत सिंह ने भी वुशु में कांस्य पदक जीता.

पिछले दो दिनों में हमने कई इतिहास बनाए. सबसे पहले आशीष कुमार ने जिम्नास्टिक में पदक जीता फिर वीरधवल खाड़े ने स्विमिंग में 24 साल के सूखे को खत्म किया. और आज रोइंग और वुशु में भी पदक जीतते हुए हमने इतिहास बनाया.

इन सभी प्रदर्शनों से गौर करने की यह बात है कि हमने कभी भी नहीं सोचा था कि जिम्नास्टिक, स्विमिंग, रोइंग या वुशु में हम पदक जीतेंगे. हम तो यही सोचते थे कि शूटिंग, कुश्ती, टेनिस, कबड्डी, भारोत्तोलन जैसे खेलों में हम अच्छा प्रदर्शन करेंगे और खूब सारे पदक बटोरेंगे. लेकिन शायद ही जो हमने सोचा था वह नहीं हुआ लेकिन जो भी हुआ अच्छा हुआ. इन सभी खिलाड़ियों ने पदक जीतने के लिए अपना जी जान लगा दिया.

Rowingबात केवल इतनी ही नहीं है. अभी दिल्ली के राष्ट्रमंडल खेलों में भी हमने एथलेटिक्स में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया. जबकि फ्लाइंग सिख ‘मिल्खा सिंह’ ने तो यहाँ तक कह दिया था कि हम एथलेटिक्स में एक भी पदक नहीं जीत पाएंगे. लेकिन वहां भी उल्टा हुआ और जो हुआ अच्छा हुआ.

इन दो उदाहरणों से यह पता चलता है कि हम भारतीयों में भी प्रतिभा है. मौका मिलता है तो हम भी अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं. कुछ कमी है तो वह यह कि हमें उपयुक्त संसाधन नहीं मिलते. अगर कोई व्यक्ति खिलाड़ी बन भी जाए तो वह सबसे पहले यह सोचता है कि ‘खिलाड़ी तो बन गए लेकिन पैसा कैसे कमाया जाए, क्योंकि उन्हें नौकरी भी नहीं मिलती, और स्पांसर तो शायद अन्य खेलों के खिलाड़ियों से नाराज़ ही रहते हैं. वह तो सिर्फ क्रिकेट से खुश रहते हैं. आखिरकार सोचने वाली बात है अगर हम उनका ध्यान नहीं रखते तो क्यों हमें उनसे पदक की आस रहती है.



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